हम सभी के साथ ऐसा होता होगा कि दिन भर नींद आती रहेगी, office में कुर्सी पर झपकी लेने का मन करता है, मीटिंग्स में आंखें भारी हो जाती हैं, लेकिन जैसे ही रात को बिस्तर पर लेटते हैं, नींद गायब। आंखें थक चुकी होती हैं, पलकें भारी लगती हैं, फिर भी नींद का कहीं नामोनिशान नहीं। कुछ बातें अंदर ही अंदर परेशान करती रहती हैं, जैसे कोई अदृश्य तीर दिल को चुभता रहता हो।
अपनी कुछ ऐसी बातें होती हैं, जो हम किसी और से चाहकर भी नहीं कह पाते। दोस्तों से, परिवार से, अपनों से
सोचते हैं ये कहना है वो कहना है, किंतु उनके सामने आते ही होंठ जैसे सील हो जाते हैं। सब जैसे गायब हो जाते हैं, कुछ कह नहीं पाते। हमें खुद ही उन बातों को खुद को सुनाना पड़ता है। क्यों?
क्योंकि हम खुद से ये सारी बातें बहुत अच्छे से करते हैं। खुद से कुछ सवाल पूछते हैं 'तूने ऐसा क्यों किया?', 'अगली बार क्या करेगा?' और खुद को ही उत्तर देते हैं, कभी सांत्वना देते हैं, कभी डांटते हैं। लेकिन जब वही बातें हम सोचते हैं कि किसी अपनों से कहें, तो कह नहीं पाते।
पता नहीं, शब्द कहां गायब हो जाते हैं। कुछ समझ नहीं आता कि कहां से बातें शुरू करें। कौन से शब्द चुनें जो दर्द को सही तरीके से बयान करें? कहीं सामने वाला इन सबका गलत मतलब न समझ ले, कह दे कि 'ओवरथिंकिंग कर रहा है तू' या 'छोड़ दे पुरानी बातें'। सारी बातें, सारे शब्द जैसे गायब हो जाते हैं, धुंध में खो जाते हैं।
फिर कुछ अजीब सी बेचैनी हो जाती है... सीने में घुटन, जैसे कोई बोझ दबा हो। नींद जैसे कहीं दूर-दूर तक दिखाई न देती। छत की तरफ देखते रहते हैं, दीवार पर घड़ी की सुइयां टिक-टिक करती जाती हैं। कभी फोन उठाते हैं, स्क्रॉल करते हैं, लेकिन मन और भटक जाता है। कभी उठकर पानी पीने चले जाते हैं, लेकिन वापस लेटते ही वही।
सारी रात बस ऐसे ही निकल जाती है। अभी तो बिस्तर पर लेटे थे, आंखें बंद की थीं, और देखते ही देखते सुबह हो गई। खिड़की से सूरज की पहली किरणें चुभने लगती हैं, और थकान का पहाड़ टूट पड़ता है। खुद को मनाते हैं कि कल पक्का कुछ नया और अच्छा होगा। कल पक्का अपनी नजरों में ऊपर उठूंगा, बेहतर बनूंगा, गलतियां सुधारूंगा, चैन से सोऊंगा।
लेकिन वो कल पता नहीं क्यों जल्दी नहीं आता। क्यों इतना देर कर रहा है? हर रात वही वादा, हर सुबह वही निराशा। आखिर कब तक खुद को खुद से झूठ बोलवाऊं कि 'कल पक्का...'।
मेरी बात की जाए तो मेरी नाकामियां ही मुझे सोने नहीं देतीं। दिन भर के काम में अपनी नाकामियों को कितनी भी छुपा लो, साथियों से मुस्कुराहट बरत लो, मीटिंग्स में जान छिड़क दो लेकिन शाम को, जब अकेले हो जाते हैं, खुद से तो छुप नहीं सकते।
वो बातें बार-बार याद आती हैं: वो प्रोजेक्ट जो समय पर पूरा न हुआ, वो बात जो गलत कह दी, वो मौका जो हाथ से निकल गया। हर नाकामी एक कांटा बनकर चुभती है, परेशान करती रहती हैं। रातें लंबी हो जाती हैं, और सुबह थकी हुई आंखों से नई शुरुआत करनी पड़ती है। इसी उम्मीद और भरोसे के साथ कि वो सुनहरा कल आज नहीं तो कल जरूर आएगा। वो सपने जो आंखों में बसे हैं, वो जरूर पूरे होंगे। बस थोड़ा और धैर्य, थोड़ा और संघर्ष और वो नई सुबह खुद-ब-खुद दस्तक देगी।
- आलसी लेखक

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